क्यों न करूँ एक चाह



जाने क्यों हर बात बुरी लगती है,
ये दिन तो चाहे कितने अच्छे है ,
लोग भी कोई कम नहीं है भले,
पर मुझे इनकी हर बात बुरी लगती है.
सारे मौसमों में बारिश  भली,
फ़ूलों से भरे चमन का मौसम ,
चाहे खिले हो हर दिल ,
मुझे तो हर एक हंसी खलती है।
दिल में एक सुकून की है तलाश ,
राह  दिखती नहीं कोई ,
तो मंजिल की आस टूटती है.
किसी के दिल में बसे  नहीं तो क्या,
नहीं मिला कोई जुनूं  तो क्या,
हर आती  साँस के साथ ,
दबी-दबी उम्मीद जगती है.
लिखे तो खत भी कई  मैंने,
कई बार इंतजार किया ,
पर ज़वाब न आये तो क्या ,
मेरी तमाम उम्र बाकी है. ……
हर एक घडी जो गुजरती है,
मेरे दिल में उम्मीद भर्ती है भरती है ,
किसी रोज तो वो भी समझेगे,
की जो ये हम पे रोज  गुजरती है।






टिप्पणियाँ

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