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समझते क्यों नहीं

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दो पलो का साथ है ,
समझते क्यों नहीं?
जिन्दगी तो एक ख्वाब है ?
तुम समझते ही नहीं ?
हर मोड़ पर ये शिकायत ,
पूरी न हो वो उम्मीदे क्यों ?
हर कदम को रोकती ,
बांधते हो जंजीरे क्यों?
मेरे भी तो थोड़े ,
ख्वाब है ,
समझते क्यों नहीं ?
वादा हर बार मत करो मुझसे ,
वादे वफ़ा नहीं होते ,
दिखती है जो हंसी ,
हर बार ख़ुशी नहीं होती .
कई बार ये मुस्कुराहट,
आएने-दर्दे-दिल होती है ?
तुम समझते ही नहीं ?
और क्या शिकायत हो ,
दुनियादारी कि,
जब तुम अपना ,
हाले दिल समझते ही नहीं ?
सारी उम्र साथ क्या निभाओगे ?
जब अपने दिल ही मिलते नहीं ?