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सावन फिर लौट तो आ .........................

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इतने dino बाद अचानक ,
फिर वो गुडिया याद आयी,
जब हम सब लड़कियां ,
पहनकर हरे फीते और चूड़िया,
लेकर गुड़ियों वाली प्लेट,
जाते थे नहर किनारे ,
जहा ढेर सारे छोटे भाई,
हाथों में लेकर छड़ी,
सरकंडो कि बड़ी-बड़ी ,
कपडे कि गुडिया डालते ही ,
जुट पड़ते थे उन्हें कूटने में ,
और यह तमाशा करने के बाद ,
सबके हाथों में होते थे ,
हमारे दिए गेहूं और चने ,
जिनके लालच ने ही ,
उनसे इतनी मेहनत करवाई थी ,
उनका यह प्रदर्शन ,
संकेतमात्र होता था ,
कोई वास्तविकता नहीं थी ,
न ही कोए हिंसा का प्रदर्शन ,
पतंगों पर होती थी जोर -अजमाइश ,
और हम बच्चे छत पर,
लिए हांथों में लंगड़ ,
बिना पेच लड़ाए ही ,
पतंगे काटने को तैयार रहते थे ,
एक पतंग पाना भी ,
हमे उल्लासित कर देता था ,
ढाब, मंझा और रंगीन पतंगे ,
बस इतनी ही हमारी सोच थी ,
अब वो दिन नहीं है ,
इन्सान खुद गुडिया बन गया ,
बच्चे भी बड़े हो गये ,
वे अब अल्हड नहीं रहे .
उन्हें पीटने के लिए ,
कपडे कि नहीं,
सजीव गुडिया चाहिए ,
वे खिलौनों से नहीं ,
जिन्दा लोगो से खेलते है ,
पतंगे खो गयी और ,
मासूमियत भी ,
अब तो यह शहर ,
जिन्दा मुर्दों से भर गया है .
इस दौर में फिर वापस ,
वो सावन कहा से लाऊ,
अब गुडिया को भूल जाऊ ,
सावन…