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April, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ढूलन भाई आईएस

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आखिर ढूलन भाई ग्रेज़ुएट हो ही गये. आठ सालों की मेहनत का फल मिल गया. गाजे-बाजे के साथ जश्न मनाया जा रहा था.लड्डू और बर्फी का दौर चल रहा था.
पिछले आठ सालो से एक अदद दुल्हन का इंतजार कर रहे ढूलन भाई को इस बार फेरे पड़ने की पूरी उम्मीद थी.शाम को लड़की वाले घर आ रहे थे.
उन्हें बहुत खुश देखकर आखिर गुप्ता जी ने पूछ ही लिया .
क्या बात है ढूलन आज तो चेहरा बड़ा ही चमक रहा है ? लगता है पास होने के आलावा भी कोई खास बात है.
ढूलन भाई शर्मा गये. शरमाते हुए उन्होंने गुप्ता जी को राजे-दिल बता ही दिया .
गुप्ता जी ने उन्हें शाम के लिए कुछ खास टिप्स दिए .
और तो सभी सामान्य ही थे पर उनमे से एक बड़ा ही अनोखा था.
गुप्ता जी ने उनसे शहर की एक नामी सिविल सर्विसेस की कोचिंग ज्वाएन करने को कहा.
ढूलन जी ने कारण पुछा तो गुप्ता जी का जवाब था .
भाई,आईएस दूल्हे के दाम बड़े अच्छे मिलते है.
अच्छी दुल्हन और अच्छा दहेज़ की गारंटी है आईएस की तैयारी.
ढूलन भाई तो आईएस का फुल फॉर्म भी नहीं जानते थे सोच में पड़ गये.
गुप्ता जी ने उनकी मुश्किल हल की .
बोले ,अरे!ढूलन फिकर मत कर आईएस बनना नहीं है केवल कोचिंग जाना है,इतना ही काफी है.
अब ढूलन भाई क…

मौत या मुक्ति

वह हवा में उड़ रहा था,
नीचे भी पड़ा हुआ था.
उसके चारो ओर नाते-रिश्तों का,
जमावडा लगा हुआ था.
पर वह था नितांत अकेला.
घबराना जायज था सो वह
भी खुद को रोक न सका.
चीखा-चिल्लाया पर सब बेकार,
किसी पर कोई असर नहीं था.
पत्नी दहाड़े मार रो रही थी,
पुत्रो में चलने की तैयारी के,
खर्चे की चर्चा हो रही थी,
आज
वे अपने पिता पर खूब खर्च करके,
पूरा प्यार लुटा देना चाह रहे थे .
बीमारी में तंगी का बहाना करने
और इलाज के खर्च से बचने के,
सारे नखरे पुराने लग रहे थे .
उन्हें जल्दी थी तो बस ,
पिता का शारीर ठिकाने लगाने की.
ताकि उन्हें वसीयत पढने को मिले.
किसको क्या मिला ये राज खुले.
अंतिम यात्रा की तैयारी में गाजे
बाजे का बंदोबस्त भी था.
आखिर भरा-पूरा परिवार जो छोड़ा था.
शमसान पर चिता जलाई गयी,
उसे याद आया
घी के कनस्टर उदेले गये,
इसी एक चम्मच घी के लिये,
बड़ी बहु ने क्या नहीं सुनाया था,
उसे लगा मरकर वह धन्य हो गया,
कुछ घंटों में निर्जीव शरीर खाक हुआ.
अब सारे लोग पास की दुकान पर,
टूट से पड़े एक साथ.
समोसे-गुझिया चलने लगे.
कुछ तो इंतजामों की करते थे बुराई,
वहीँ कुछ ने तारीफों की झडी लगायी,
अब उससे सहन नहीं हुआ ,
और वह छोड़कर सभी को ,
इक ओर चल पड़ा,
यह…

क्या यही है देश का भविष्य?

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हम लाये हैं तूफान से किस्ती निकाल के .........इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के ........गीत की पंक्तियाँ तो बड़ी मधुर है पर इनका असली मकसद शायद किसी की भी समझ में नहीं आया है.भाई जब देश का बचपन ही अनपढ़ और काम के बोझ से दबा होगा तो भविष्य की कल्पना करना ही बेकार है . इसमे सरकार का भी क्या दोष .उनका काम तो योजनाये बनाना है . उनका लाभ इन बच्चो को मिले इसके लिए इनके अभिवावकों और समाज को जागरूक होना पड़ेगा.आइए हम सब इस मुहीम में शामिल हो जाये .....................

जय हो माता निर्मला देवी !

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अब कौन समझाये की देश से बढ़कर कुछ भी नही। अपने आप को भगवान् कहने वाले लोग क्यों भूल जाते है की वे भी भारत में पैदा हुए है। पैरो पर तिरंगा !उफ़ ,यह अपमान ।