संदेश

पीरियड के दौरान एक दिन की पेड लीव..........वॉओ या नो-नो!!!!!

चित्र
मैकेनिकल इंजीनियर नमिता का मूड़ आज सुबह से ही उखड़ा था, ऑफिस में काम का अंबार और शरीर साथ नहीं दे रहा था। एक करके कामों को निपटाना और समय के साथ-साथ दर्द का बढ़ना, और उफ उसके बर्दाश्त के बाहर हो गया था। वह बॉस के केबिन में पहुंच गई, ’सर! आज मेरी तबियत ठीक नहीं है, मुझे हाफ डे चाहिए।’ यही कहानी नमिता की ही नहीं सभी कामकाजी महिलाओं की है। अपने मासिक धर्म के चार दिनों में सभी महिलाएं मूड स्विंग, बेचैनी असहनीय दर्द का शिकार रहती हैं। इन दिनों के दौरान भी उन पर घर और बाहर के कामों का दबाव रहता है। इस दौरान वे  असहनीय पीड़ा सहन करती हैं। यह असाधारण शक्ति केवल महिलाओं में ही होती है। और इस मुश्किल को कामकाजी महिलाओं के लिए आसान बनाया है, मुबई की कल्चर मशीन ने यह पहला कदम उठाकर इस बहस को जीतने की दिशा में एक नई पहल कर दी है।

काफी दिनों से इस बात को लेकर बहस चल रही है कि पीरियड के दौरान कामकाजी महिलाओं को पेड लीव मिलनी चाहिए या नहीं। कई वृंदा करात सहित कई समाज सेवक इस बात का झंडा बुलंद किए हुए हैं कि इन दिनों के दौरान महिलाओं के शरीर को आराम की आवश्यकता होती है। उनका शरीर कई तरह के हार्मोनल उतार-चढ़…

हिमानिका-भाग 2

चित्र
बहती नदियां बनी तुषार,
धरातल ओढ़े श्वेत आवरण,
अम्बर भी तुहिनमयी दिखता,
प्रकृति का दृश्य विलक्षण।
किसी ओर न कुछ भी दीखता,
बस श्वेत-श्वेत और श्वेत,
कई प्रकाशवर्षों की दूरी धरती से,
तय करके विद्रोही का यान,
उतरा इस हिमनिकेतन पर,
दृश्य देख अचंभित था मन।
चलते-चलते थकते थे पांव,
दिखती नहीं दूर तलक छांव,
धूप नहीं गलन यहां थी,
हिम खंड संकलन यहां थे।
मीलों दूरी पर जाकर के,
हिमखंडों के ही भवन बने,
धरती पर जैसे इग्लू हो,
पर जरा भिन्न से थे वो।
पूरी बस्ती थी यों दिखती,
जैसे हो इक ग्राम बड़ा,
आदि कहां और अंत कहां,
समझ न कुछ भी आ रहा।
नगर के भीतर इक अविराम,
लगा था बहुत बड़ा बाजार,
लो दिखते थे बड़े विचित्र,
वस्तुएं  भी लगती थी भिन्न।
अजब भाषा अजब बोली,
रहन-सहन परिधान थे भिन्न,
श्वेत खाल पर रुई के फाहे,
लंबे से चोगे से वस्त्र।
आंखों की पुतलियां हरी,
लम्बी पलके हर स्त्री की,
त्वचा का रंग दिखे था यो,
श्वेत रंग केसर मिला ज्यों।
कुछ विचित्र पशु-पक्षी थे,
दो पैरों पर ज्यों खड़े हुए,
लम्बी गर्दन, नाखूनी पंजे,
पर रस्सी से थे बंधे हुए।







हिमानिका -पहला भाग

चित्र
मन में कुछ कल्पनाएं आईं, जिन्हें पंक्तियों में बांधने का प्रयास किया। मन किया कहानी कहूं पर कविता के रूप में, तो प्रस्तुत है, यह प्रयास। यह कहानी है, एक लड़के की और विज्ञान के प्रति उसकी दीवानगी की। वह हमेशा ग्रह और तारों की दुनिया में ही खोया रहता, इस रहस्यमयी ब्रम्हांड को जानने की उसकी उत्सुकता ने उसे पूरी दुनिया से काट दिया था, जब वह अपने प्रयास में सफल होता है, उसके साथ क्या-क्या घटनाएं होती हैं, इन्हें बांधने का प्रयास किया है।
....................................................................अग्रिम पंक्तियों एक लंबी कविता के रूप में इस किस्सागोई प्रस्तुत है, इसे विज्ञान कथा भी कह सकते हैं।



है ब्रम्हांड अनंत और विशाल,
कितने ग्रह कितनी शाखाएं,
न जाने कितनी आकाशगंगाएं,
आकाशगंगाओं  के भ्रमर में,
घूमते कितने सौरमंडल।
न जाने कितने सूर्यो और,
कितने ही सौर मंडलों से घिरा,
बना है कैसे यह सब,
भेद किसी को भी न मिला।
यह सोचकर ही वह विद्रोही,
नित नए प्रयोग जमाता था,
अपनी छोटी प्रयोगशाला में,
तारों की गिनती करता था।
और ग्रहों का भी अध्ययन,
उनके इतिहास का संग्रहण,
ढेरों किताबें आस-पास
बस यही था उसका आवास।
उसक…

कुछ कहना है ,सुकून के लिए

चित्र
जिंदगी के चार साल यूं ही निकल गए पता ही नहीं लगा , जिंदगी जैसे ठहर गयी हो. कोई नई सोच नहीं कोई नया काम नहीं। एक ही काम ऐसा था जो मुझे अच्छा लगता था।  मेरी जॉब जो सैलरी से ज्यादा मुझे ख़ुशी देती थी।  मुझे ऐसा लगता था की मेरी भी जिंदगी में कुछ है , कुछ है जहाँ मई खुद हूँ कोई और नहीं।  जो भी है वो मेरी मेहनत से है। दो साल पहले उससे भी हाथ  धोने  पड़े। कारण  तुम्हारे साथ मुझे आना पड़ा। शायद एक अच्छी पत्नी बनने के लिए खुद को भूलना पड़ता है। मेरी जॉब जरूरी नहीं थी क्योकि मेरा काम  तो तुम्हे और तुम्हारी फॅमिली को एंटरटेन करना है । मेरे घरवाले शादी का एप्लीकेशन लेकर तुम्हारे घर गए थे ,जैसा की तुम हमेशा कहते हो , तुम्हारे  घरवाले तो नहीं आये थे। उन्होंने वादा किया था तो मुझे निभाना पड़ेगा ही। । तुम्हारे परिवार और तुम्हारे प्रति मेरी जिम्मेदारिया है , मुझे ये करना चाहिए,  वो करना चाहिए , तुम्हे आप कहना चाहिए और अपनी जॉब की बात न न बिलकुल नहीं क्योकि मेरा सबसे पहला काम तो घर  है,  औरते यही तो करती है फिर तुम कौन सा नया काम कर रही हो  और भी न जाने क्य………………………।
 उफ़  कितनी साडी घरेलू  बातें सुन सुन क…

याद है मुझे

चित्र
आज भी जब  देखती हूँ ,
किसी को अपने पिता  के साथ ,
तब जाने क्यों आती है ?
मुझे आपकी याद।
कई बार तो जब कोई अजनबी ,
आपकी कद-काठी का ,
मोटरसाइकिल पर सवार ,
धीरे -धीरे उसे चलाता ,
हैलमेट के साथ ,
और मानता है  सारे ट्रैफिक नियम ,
 भ्रम होता है मुझे की आप ही है ,
और याद आ  जाते है आप।
 जब भी मुझे मेरे अधूरे सपने ,
पूरे  होते हुए दीखते है ,
ऐसा लगता है  मैने ,
थोड़ा  ही सही कुछ पाया है।
 आप ठहराते थे गलत,
हर बात पर  मुझे वो भी  याद है।
 लगता है की कही से भी  बार ,
मै ला सकूँ वापस ,
 और  कह सकूँ  की मुझे,
 आपसे कोई शिकायत नहीं है।
काश ! मै आपको बता  पाती ,
कि  मुझे केवल बहस करना ही नहीं ,
 आपसे प्यार करना भी आता है।
कई बार जब कठिन  होती है राह ,
तब  काम आतें है मेरे ,
 आपके दिए हुए विचार ,
तब  लगता है मुझे,
कि बचपन तो बचपन ही होता है,
और  उसे  अच्छी जवानी बनाने  के लिए ,
वह   सब कितना जरूरी होता है,
जो आप करते थे।
शायद आप  जानते थे ,
की  यहाँ आपको ज्यादा नहीं  रहना है।
इसीलिए  कभी आपने मुझे ,
अपना सहारा नहीं थमाया ,
 हर बार मुझे आगे करके ,
आत्मनिर्भर बनाना  चाहते थे।
मेरे फेल होने  गारंटी दे…

क्यों न करूँ एक चाह

जाने क्यों हर बात बुरी लगती है,
ये दिन तो चाहे कितने अच्छे है ,
लोग भी कोई कम नहीं है भले,
पर मुझे इनकी हर बात बुरी लगती है.
सारे मौसमों में बारिश  भली,
फ़ूलों से भरे चमन का मौसम ,
चाहे खिले हो हर दिल ,
मुझे तो हर एक हंसी खलती है।
दिल में एक सुकून की है तलाश ,
राह  दिखती नहीं कोई ,
तो मंजिल की आस टूटती है.
किसी के दिल में बसे  नहीं तो क्या,
नहीं मिला कोई जुनूं  तो क्या,
हर आती  साँस के साथ ,
दबी-दबी उम्मीद जगती है.
लिखे तो खत भी कई  मैंने,
कई बार इंतजार किया ,
पर ज़वाब न आये तो क्या ,
मेरी तमाम उम्र बाकी है. ……
हर एक घडी जो गुजरती है,
मेरे दिल में उम्मीद भर्ती है भरती है ,
किसी रोज तो वो भी समझेगे,
की जो ये हम पे रोज  गुजरती है।






बंजारा सी है जिन्दगी

बंजारा सी है जिन्दगी
हर पल ले जाती है एक  संसार में
हर नया दिन मुझे एक नया
अनुभव दे रहा है ,
विस्मृत हो चुकी है जो बाते
उनका मतलब बदल गया है
और आने वाले समय ने खुद में
न जाने कितनी बातें छुपा रखी है
कहाँ से कहाँ ले जा रही है मुझे
जीवन जीने की प्यास
कुछ पाने की तलाश
हर पल बना रही है मुझे
और अधीर
क्योकि
यही तो बंजारा जिन्दगी है
जो हर पल बदती आगे ही है
देती है हमे न जाने कितने अनुभव
और हर पल हमें विद्यार्थी
ही बनाये रखती है ,
और अच्छा ही की हम बंजारे ही बने रहे
जिन्दगी के खजाने खोजते रहे
बीएस हमेशा पाते ही रहे
और खोने से न डरे