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हिमानिका -पहला भाग

मन में कुछ कल्पनाएं आईं, जिन्हें पंक्तियों में बांधने का प्रयास किया। मन किया कहानी कहूं पर कविता के रूप में, तो प्रस्तुत है, यह प्रयास। यह कहानी है, एक लड़के की और विज्ञान के प्रति उसकी दीवानगी की। वह हमेशा ग्रह और तारों की दुनिया में ही खोया रहता, इस रहस्यमयी ब्रम्हांड को जानने की उसकी उत्सुकता ने उसे पूरी दुनिया से काट दिया था, जब वह अपने प्रयास में सफल होता है, उसके साथ क्या-क्या घटनाएं होती हैं, इन्हें बांधने का प्रयास किया है।
....................................................................अग्रिम पंक्तियों एक लंबी कविता के रूप में इस किस्सागोई प्रस्तुत है, इसे विज्ञान कथा भी कह सकते हैं।



है ब्रम्हांड अनंत और विशाल,
कितने ग्रह कितनी शाखाएं,
न जाने कितनी आकाशगंगाएं,
आकाशगंगाओं  के भ्रमर में,
घूमते कितने सौरमंडल।
न जाने कितने सूर्यो और,
कितने ही सौर मंडलों से घिरा,
बना है कैसे यह सब,
भेद किसी को भी न मिला।
यह सोचकर ही वह विद्रोही,
नित नए प्रयोग जमाता था,
अपनी छोटी प्रयोगशाला में,
तारों की गिनती करता था।
और ग्रहों का भी अध्ययन,
उनके इतिहास का संग्रहण,
ढेरों किताबें आस-पास
बस यही था उसका आवास।
उसके परिवार में था न कोई,
इकला ही चलता आया था,
उसके इस नशे ने ही,
सबका साथ छुड़ाया था।
कुछ भी अलग करने चलो,
नाराजगी है सहनी पड़ती,
जो भीड़ से अलग है चलता,
संसार उसके पीछे पड़ता।
कुछ यो ही उस विद्रोही का,
हाल बना था वर्षों से,
घर की इक-इक पाई,
जा रही थी इन खर्चों में।
एक यान बनाने में उसने,
विज्ञान का खूब उपयोग किया,
समय और पृथ्वी के पार,
जाने का उद्योग किया।
काल चक्र भी घूम गया,
उस विद्रोही के साहस से,
फिर करके सारा उद्यम,
चला समय से फिर वो परे।
नीले अम्बर के आर-पार,
ग्रह था एक विशाल बड़ा,
कितने दिनों से छुपा पड़ा,
न मानव का यहां कदम पड़ा।
मिल्की वे से दूर कहीं,
पृथ्वी सी ही इक दशा बनी,
था थोड़ा सा ही बस अंतर,
हिममयी था पूरा वातावरण।---- आगे जारी ा 

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